कभी-कभी किसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी जीत गोल्ड मेडल नहीं होती। कुछ जीत ऐसी होती हैं जो आने वाले कई सालों के लिए रास्ता खोल देती हैं। ट्रीसा जॉली और गायत्री गोपीचंद का वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीता गया ब्रॉन्ज भी कुछ ऐसा ही है।
दिल्ली में अपने ही लोगों के सामने खेल रही इस जोड़ी ने ऐसा प्रदर्शन किया कि अब भारतीय महिला डबल्स को लेकर उम्मीदें फिर बढ़ गई हैं। फाइनल का टिकट भले ही नहीं मिला, लेकिन पोडियम तक पहुंचना अपने आप में बड़ी बात है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि ट्रीसा और गायत्री दोनों अभी सिर्फ 23 साल की हैं।
ट्रीसा और गायत्री जब इस टूर्नामेंट में उतरीं, तब उनके ऊपर दुनिया की सबसे बड़ी जोड़ियों जैसी चर्चा नहीं थी। लेकिन मैच आगे बढ़ते गए और दोनों ने हर मुकाबले के साथ खुद को साबित किया। क्वार्टर फाइनल तक पहुंचना ही बहुत बड़ी बात थी। लेकिन वहां उन्होंने मजबूत चीनी जोड़ी को हराकर सबको चौंका दिया। उस जीत के बाद साफ हो गया कि दोनों खिलाड़ी यहां सिर्फ अनुभव लेने नहीं आई हैं।
फिर सेमीफाइनल में सामने आई दुनिया की नंबर-1 जोड़ी
सेमीफाइनल में भारतीय जोड़ी के सामने चीन की लियू शेंगशू और टैन निंग थीं। मुकाबला आसान नहीं था, लेकिन ट्रीसा और गायत्री ने शुरुआत में ही बता दिया कि वे दबाव में पीछे हटने वाली नहीं हैं। बाद में चीनी खिलाड़ियों ने वापसी की और अगले दो गेम जीत लिए। भारतीय जोड़ी फाइनल से बाहर हो गई, लेकिन तब तक उनका मेडल पक्का हो चुका था यानी हार के बाद भी दोनों खाली हाथ नहीं लौटीं।
इस ब्रॉन्ज में 15 साल की कहानी छिपी है
महिला डबल्स में भारत को वर्ल्ड चैंपियनशिप का पिछला मेडल 2011 में मिला था। तब ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की जोड़ी ने यह कारनामा किया था। अब इतने लंबे इंतजार के बाद ट्रीसा जॉली और गायत्री गोपीचंद ने फिर भारत को महिला डबल्स के पोडियम पर पहुंचाया है। यही वजह है कि इस मेडल को सिर्फ एक ब्रॉन्ज मेडल कह देना थोड़ा कम होगा।
